
रामनगर/भीमताल। देवभूमि उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के तमाम दावों के बीच जमीनी हकीकत लगातार डराने वाली तस्वीर पेश कर रही है। कॉर्बेट से सटे इलाकों से लेकर पहाड़ी गांवों तक बाघ और गुलदार के हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। बीते एक महीने में ही अलग-अलग घटनाओं में चार लोगों की जान जा चुकी है, जिससे स्थानीय लोगों में भय और आक्रोश दोनों बढ़ता जा रहा है।
ताजा मामला रामनगर वन प्रभाग की अपर कोसी रेंज का है। नया बाईपास पुल के पास शनिवार देर शाम एक बाघ ने सड़क के समीप मौजूद एक अज्ञात व्यक्ति पर हमला कर उसे जंगल के भीतर घसीट लिया। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया, लेकिन घना अंधेरा होने के कारण रात में अभियान रोकना पड़ा।
रविवार तड़के पुनः सर्च अभियान चलाया गया। फायरिंग और बम-पटाखों के बीच बाघ के पदचिह्नों का पीछा करते हुए टीम लगभग दो किलोमीटर भीतर जंगल में पहुंची, जहां व्यक्ति का अधखाया शव बरामद हुआ। वन विभाग के अनुसार शव के रूप में केवल सिर ही मिल पाया, शेष अंगों को बाघ खा चुका था।
रामनगर वन प्रभाग के एसडीओ अंकित बडोला ने बताया कि मृतक की फिलहाल शिनाख्त नहीं हो पाई है। शव को पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया है और पहचान के लिए डीएनए सैंपलिंग कराई जाएगी। कोतवाल सुशील कुमार के अनुसार शव को सरकारी अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखा गया है और 72 घंटे बाद पोस्टमार्टम की कार्यवाही की जाएगी।
बताया जा रहा है कि जिस सड़क के पास यह घटना हुई, वहां लोग अक्सर घूमने जाते हैं। आशंका है कि बाघ ने इसी दौरान व्यक्ति को सड़क से उठाकर जंगल में खींच लिया होगा।
इधर, भीमताल के हैड़ियागांव में गुलदार का आतंक ग्रामीणों के लिए बड़ी मुसीबत बना हुआ है। दिन दहाड़े गांव में गुलदार दिखाई देने और लगातार गुर्राने की आवाजें सुनाई देने से लोग दहशत में हैं। बच्चे स्कूल जाने से डर रहे हैं, महिलाएं मवेशियों के लिए चारा लाने में असमर्थ हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गुलदार कई बार लोगों पर झपट चुका है और रात में घरों के आंगन तक घूमता नजर आया है।
ग्राम प्रधान प्रदीप कुमार और क्षेत्र पंचायत सदस्य देवेश कुमार ने वन विभाग पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि सूचना देने के बावजूद न तो नियमित गश्त हो रही है और न ही पिंजरा लगाया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई अनहोनी होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी वन विभाग की होगी।
एक ओर वन विभाग लगातार लोगों से जंगल की ओर न जाने की अपील कर रहा है, वहीं दूसरी ओर गांवों और सड़कों के आसपास ही वन्यजीवों की मौजूदगी हालात को और गंभीर बना रही है। देवभूमि में मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के सरकारी दावों के बीच लगातार हो रही ये घटनाएं व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रही हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन और वन विभाग कब तक केवल अपीलों तक सीमित रहता है और कब ठोस कदम उठाकर लोगों को इस बढ़ते खतरे से राहत दिलाता है।



