नैनीताल हाईकोर्ट से वन गुर्जरों को बड़ी राहत, दावों के निस्तारण तक नहीं किया जाएगा भूमि से बेदखल

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वन गुर्जर समुदाय को कब्जे वाली जमीन से बेदखली से जुड़े मामले में नैनीताल हाईकोर्ट से राहत मिली है.

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वन गुर्जर समुदाय के हितों की रक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आलोक माहरा की एकलपीठ में 22 जनवरी को हुई थी. जिसके आदेश की प्रति आज 28 जनवरी को सामने आई.

न्यायमूर्ति आलोक माहरा की एकलपीठ ने 22 जनवरी को राज्य सरकार और वन विभाग को आदेश दिया था कि जब तक वन गुर्जरों द्वारा प्रस्तुत वनाधिकार दावों का अंतिम रूप से निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक उन्हें उनके कब्जे वाली भूमि से बेदखल न किया जाए और न ही उनकी कृषि गतिविधियों में कोई हस्तक्षेप किया जाए.

मो.अली सहित दर्जन भर अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’ के नियमों का कड़ाई से पालन करने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वन अधिकारी बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के उन्हें उनकी पारंपरिक भूमि से हटाने की धमकी दे रहे हैं और खेती करने से रोक रहे हैं.

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वन गुर्जर एक मान्यता प्राप्त वन-निवासी समुदाय है, जिनका मुख्य आधार पशुपालन और कृषि है. उन्होंने दलील दी कि तराई पूर्वी वन प्रभाग से संबंधित दावों के संबंध में जिलाधिकारियों और वन अधिकारियों को मई और जून 2025 में कानूनी नोटिस और प्रत्यावेदन दिए गए थे, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी शासन स्तर पर इन पर कोई निर्णय नहीं लिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है.

राज्य सरकार के अधिवक्ता ने अदालत को सूचित किया कि ग्राम प्रधान और अन्य संबंधित अधिकारियों की अनुपलब्धता के कारण आवेदनों पर विचार करने में देरी हुई है. हालांकि, सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि फिलहाल याचिकाकर्ताओं के खिलाफ बेदखली की कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है. कोर्ट ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए निर्देश दिया कि लंबित दावों का निस्तारण कानून के अनुसार यथाशीघ्र किया जाए.

अदालत ने याचिका को निस्तारित करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक दावों पर अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक वन गुर्जर अपनी भूमि पर शांतिपूर्ण कब्जा बनाए रख सकते हैं और खेती कर सकते हैं. हालांकि, न्यायमूर्ति माहरा ने यह सख्त शर्त भी लगाई कि इस भूमि का उपयोग केवल कृषि कार्यों के लिए ही किया जाएगा और इसका किसी भी प्रकार के व्यावसायिक या गैर-कृषि गतिविधियों के लिए डायवर्जन नहीं होगा.