
रामनगर। विकासखंड सभागार में आयोजित मालिकाना हक संघर्ष समिति के जन सम्मेलन में हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत पारंपरिक वन निवासियों को मिलने वाले अधिकारों को लेकर सरकार और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन विशेष रूप से वन अधिकार अधिनियम के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है, क्योंकि जमीनी स्तर पर इस कानून का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत पारंपरिक वन क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों को कई महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं, जिनमें सबसे पहला अधिकार बेदखली से सुरक्षा का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वन भूमि पर निवास से जुड़े दावों का अंतिम निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक किसी भी व्यक्ति को हटाया नहीं जा सकता। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट और निरंतर आदेश मौजूद हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में वन विभाग द्वारा एकतरफा तरीके से वन अधिकार दावों को खारिज किया जा रहा है। विभाग का दावा है कि 6 से 7 हजार दावों को एक ही दिन में निरस्त कर दिया गया, जबकि अधिनियम की प्रक्रिया इसके बिल्कुल विपरीत है। कानून के अनुसार पहले टोंगिया पद्धति और वनग्रामों की सूची तैयार कर उसका प्रकाशन किया जाना चाहिए, इसके बाद वन अधिकार समितियों का गठन कर विधिवत दावे आमंत्रित किए जाने चाहिए, लेकिन न तो समितियों का गठन किया गया और न ही दावे लेने की वैधानिक प्रक्रिया अपनाई गई।
उन्होंने बताया कि इस मुद्दे को पूर्व में हाईकोर्ट में उठाया गया था, जिस पर न्यायालय ने आदेश दिया कि वन अधिकार दावों की जांच प्रक्रिया में उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से एक सिविल जज को समिति का सदस्य बनाया जाए, ताकि मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके। उन्होंने दो टूक कहा कि एकतरफा और मनमाने ढंग से दावों को खारिज करना कानूनन पूरी तरह गलत है।
दुष्यंत मैनाली ने आरोप लगाया कि राज्य में पारंपरिक वन निवासियों, जिनमें गुर्जर समुदाय और पर्वतीय क्षेत्रों में पीढ़ियों से रह रहे लोग शामिल हैं, को अवैध अतिक्रमणकारी बताकर हटाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों से प्रशिक्षण लेकर आने वाले नए वन अधिकारियों को उत्तराखंड की पारंपरिक सामाजिक और वन व्यवस्था की पर्याप्त जानकारी नहीं होती, जिसके कारण ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र है, वहां बड़ी आबादी जंगलों में निवास करती है, लेकिन उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की लगातार अनदेखी की जा रही है। इन्हीं मुद्दों को लेकर यह सम्मेलन आयोजित किया गया, ताकि ग्रामीणों, वनवासियों और पारंपरिक निवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा सके।
जन सम्मेलन में ब्लॉक प्रमुख मंजू नेगी, ज्येष्ठ उप प्रमुख संजय नेगी, पूर्व मंत्री अमिता लोहनी, मालिकाना हक संघर्ष समिति के अध्यक्ष एस. लाल, पूर्व प्रधान मोहम्मद ताहिर, फरजाना, निखिल भट्ट, रवि कुमार, शारदा देवी, तुलसी देवी, मोहन राम, गुसाई राम, नबी, नूर आलम, सलीम सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।



