बस स्टैंड वाली ऐतिहासिक रामलीला की पंचम रात्रि में राम वनवास का मंचन, कलाकारों के अभिनय ने बांधा समां

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रुद्रपुर। नगर की प्रमुख, प्राचीन एवं ऐतिहासिक बस स्टैंड वाली श्री रामलीला में पंचम रात्रि प्रभु श्रीराम के राजतिलक की घोषणा से लेकर उनके वन प्रस्थान तक की भावपूर्ण लीला का मंचन किया गया। अयोध्या में उत्सव की तैयारियों के बीच मंथरा के षड्यंत्र, कैकयी के हठ और राजा दशरथ की विवशता ने कथा को करुण प्रसंग में बदल दिया। कलाकारों ने प्रभावशाली संवाद अदायगी और सजीव अभिनय से इन दृश्यों की संवेदनाओं को प्रस्तुत किया।

पंचम रात्रि की रामलीला का उद्घाटन मुख्य अतिथि सिंह फिजियोथेरेपी के एमडी डा० धनंजय सिंह, श्रीमती अंजू सिंह, रुद्रांश सिंह, दिव्यांशी सिंह नें सपरिवार दीप प्रज्जवलित कर किया। श्री रामलीला कमेटी ने सभी अतिथियों का माल्यार्पण कर व स्मृति चिन्ह देकर सम्मनित किया।

लीला का शुभारंभ श्रीराम बारात के अयोध्या लौटने के प्रसंग से हुआ। राजा दशरथ ने राम को राजपाट सौंपने के विषय में विचार-विमर्श किया और उनके राजतिलक की घोषणा कर दी। इस घोषणा से अयोध्या में प्रसन्नता का वातावरण बन गया। राजमहल में उत्सव की तैयारियों के दृश्य ने उस उल्लास को दर्शाया, जो प्रभु श्रीराम को भावी राजा के रूप में देखने की कल्पना से जुड़ा था।

इसके बाद दासी मंथरा द्वारा रानी कैकयी को भड़काने का दृश्य मंचित हुआ। मंथरा ने भरत के भविष्य को लेकर कैकयी के मन में आशंका उत्पन्न की और उन्हें राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांगने के लिए उकसाया। उसके प्रभाव में आकर कैकयी कोपभवन में जा बैठीं। रानी की नाराजगी का समाचार मिलने पर दशरथ वहां पहुंचे और उन्हें मनाने का प्रयास करने लगे।

कैकयी ने दशरथ को उनके पूर्व वचन का स्मरण कराते हुए भरत के लिए राजपाट और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा। यह सुनते ही दशरथ व्याकुल हो उठे। उन्होंने भरत को राज्य देने पर सहमति जताई, लेकिन राम को वन भेजने का आग्रह छोड़ने के लिए कैकयी से बार-बार मनुहार की। पुत्र वियोग की आशंका से टूटते पिता की पीड़ा और अपने वरदानों पर अडिग कैकयी का संवाद इस रात्रि की लीला का अत्यंत मार्मिक प्रसंग रहा।

राजमहल की इस परिस्थिति की जानकारी मिलने पर श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए सहज भाव से वनवास स्वीकार किया। राजसिंहासन के स्थान पर वन का कठिन जीवन चुनने के उनके निर्णय में त्याग, कर्तव्य और मर्यादा का संदेश उभरा। कलाकारों ने राम के धैर्य और दशरथ की व्यथा के बीच भावनात्मक अंतर को प्रभावपूर्ण ढंग से मंच पर जीवंत किया।

अंत में प्रभु श्रीराम के वन प्रस्थान का दृश्य मंचित हुआ। राजतिलक की खुशियों से वनवास के दुख तक पहुंची कथा ने पारिवारिक संबंधों, वचन की गरिमा और त्याग के महत्व को रेखांकित किया। पंचम रात्रि की लीला भावपूर्ण अभिनय और मार्मिक संवादों के साथ संपन्न हुई।

 

आज, कैकयी की भूमिका में संजीव आनन्द, मंथरा की भूमिका में नरेश छाबड़ा, राजा दशरथ की भूमिका में प्रेम खुराना, राम की भूमिका में मनोज अरोरा, सीता की भूमिका में दीपक अग्रवाल, लक्ष्मण की भूमिका में गौरव जग्गा, भरत जय तनेजा, शत्रुघन की भूमिका में आयुष्मान सुशील गाबा, गणेश भगवान की भूमिका में आशीष ग्रोवर, नें शानदार अभिनय कर उपस्थित हजारो जनता का मन मोह लिया।

इस दौरान रामलीला कमेटी के अध्यक्ष मनोज गाबा, महामंत्री सुशील गाबा, कोषाध्यक्ष सीए अमित गंभीर, समन्यवयक राजश छाबड़ा, विजय अरोरा, नरेश शर्मा, सुभाष खंडेलवाल, ओमप्रकाश अरोरा, महावीर आजाद, अमित अरोरा बोबी, राकेश सुखीजा, अशोक गगनेजा, गुरशरण बब्बर शरणी, गौरव तनेजा, गौरव राज बेहड़, सचिन आनन्द, विजय विरमानी, अमित चावला, सचिन तनेजा, आदि सहित हजारो दर्शक मौजूद थे। मंच संचालन वरिष्ठ समाजसेवी संदीप धीर एवं मंच सचिव विजय जग्गा नें किया।

*मंथरा व कौशल्या के अभिनय में ,,,,,नरेश छाबड़ा*

30साल तक कैकई का दमदार व संजीदा अभिनय कर चुके इस बार क्लब ने उन्हें दासी मंथरा व महारानी कौशल्या के अभिनय करने की सेवा सौंपी है मंथरा का अभिनय एक नकारात्मकता भरा अभिनय है जो अपने कुटिलता भरे संवादो से रानी कैकयी का मस्तिष्क पलट देती है और उन्हें राम को बनवास ही देना पड़ता है वहीं महारानी कौशल्या के पात्र का अभिनय संजीदा जो दया व ममताभरा है दोनो ही विरोधी पात्रों में उन्होंने अपनी प्रतिभा अभिनय कला का सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है उनका मानना है कि अभिनय के लिए साफ सुंदर चेहरे का होना आवश्यक है जिस अभिनय के सभी भाव स्पष्ट दिखाई दे तथा साफ आवाज के साथ-साथ आवाज का उतार- चढ़ाव सही ज्ञान हो ,बाडी लेंग्वेज बढ़िया गेट अप व सिक्रिप्ट एक कलाकार के अभिनय में चार चांद लगाता है सुंदर गायकी के साथ सुर-ताल का ज्ञान आवश्यक है नरेश को गायन व आर्टिकल लेखन में रूचि है. वर्ष 1988 से वह मंच से जुड़कर अनेक पुरुष व लगभग सभी महिला पात्रों का अभिनय कर चुके हैं लीला मंचन के दौरान उनकी अभिनय प्रतिभा देखते ही बनती है व दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं जब तक प्रभु श्रीराम की कृपा होगी तब तक इसे जारी रखेंगे