
रुद्रपुर: जिला मुख्यालय क्षेत्र में उत्तराखंड भू-कानून से जुड़े मामलों में कथित तौर पर कूटरचित दस्तावेज तैयार कर जमीन की खरीद-बिक्री किए जाने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। रुद्रपुर तहसील क्षेत्र में एक मामले में शिकायत के बाद न्यायालय की शरण लेने और परिवाद दर्ज होने के बाद अब गदरपुर तहसील क्षेत्र से भी ऐसा ही एक नया मामला सामने आया है। इसमें पिता-पुत्र पर कथित रूप से कूटरचित खतौनी तैयार कर जमीन खरीदने और बाद में उसे भोले-भाले लोगों को बेचने का आरोप लगाया गया है।
बताया गया कि रुद्रपुर तहसील क्षेत्र के खाता संख्या और खसरा संख्या से संबंधित वर्ष 2003 की भूमि के दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ कर उन्हें आधार बनाकर कृषक की भूमि खरीदने का मामला सामने आया था। समाजसेवी मनीष बावा की ओर से मामले की शिकायत प्रशासनिक अधिकारियों से की गई थी। शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए मनीष बावा ने न्यायालय की शरण ली। न्यायालय ने मामले को संज्ञान में लेते हुए परिवाद के रूप में दर्ज कर लिया है।
इसी बीच अब गदरपुर क्षेत्र में भी कथित तौर पर इसी तरह का मामला सामने आया है। आरोप है कि पिता-पुत्र ने मिलकर कूटरचित दस्तावेज तैयार किए और उनके आधार पर जमीन की खरीद की। इसके बाद उक्त जमीन को अन्य लोगों के हाथ बेच दिया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसमें ऐसी भूमि की भी खरीद-बिक्री की गई, जो सरकारी संपत्ति से संबंधित बताई जा रही है।
*रजिस्ट्री के समय दस्तावेजों की जांच पर बड़ा सवाल*
मामले ने तहसील और रजिस्ट्री कार्यालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जमीन की रजिस्ट्री के दौरान संबंधित दस्तावेज रजिस्ट्रार कार्यालय में प्रस्तुत किए जाते हैं और राजस्व अभिलेखों से उनका सत्यापन भी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। ऐसे में यदि दस्तावेजों में कूटरचना कर भूमि की प्रकृति या पुराने अभिलेखों को बदलकर प्रस्तुत किया गया, तो सवाल यह है कि रजिस्ट्री से पहले इन दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ ।
शिकायतकर्ता का कहना है कि राजस्व अभिलेख और पूर्व की खतौनियां विभागीय रिकॉर्ड में मौजूद हैं। इसके बावजूद कथित तौर पर कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर भूमि की खरीद-बिक्री कैसे होती रही, यह जांच का विषय है।
*क्या मिलीभगत से चल रहा भू-माफिया का खेल*
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या दस्तावेजों में कथित हेरफेर करने वाला कोई नेटवर्क सक्रिय है? क्या रजिस्ट्री से पहले राजस्व अभिलेखों का समुचित सत्यापन किया जाता है? और यदि दस्तावेजों में गड़बड़ी थी तो संबंधित स्तर पर इसकी पहचान क्यों नहीं हो सकी?
हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन मामलों की लगातार सामने आ रही शिकायतों ने प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अब देखना होगा कि प्रशासन इन मामलों की निष्पक्ष जांच कर कथित कूटरचना के पीछे जिम्मेदार लोगों तक पहुंचता है या मामला जांच की फाइलों तक ही सीमित रह जाता है।
नोट: मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। संबंधित अधिकारियों और आरोपित पक्ष का पक्ष सामने आने पर खबर को और संतुलित रूप से अपडेट किया जा सकता है।



