ई-कचरे में छिपा रोजगार का खजाना! उत्तराखंड में ग्रीन जॉब्स की नई राह, कबाड़ बनेगा कमाई का जरिया

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ई-वेस्ट को अब प्रदूषण और जहरीले कचरे के रूप में न देखकर रोजगार से नजरिए से देखा जा रहा है.
देहरादून: ई-वेस्ट अब केवल पर्यावरण की चुनौती नहीं, बल्कि छोटे उद्यमियों, युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार और कारोबार का नया अवसर बनकर उभर रहा है. उत्तराखंड में भी इस दिशा में कई पहल शुरू हो चुकी हैं. घरों में पड़े पुराने मोबाइल, खराब लैपटॉप, टूटे टीवी, बेकार फ्रिज, इस्तेमाल से बाहर हो चुकी बैटरियां और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अब सिर्फ कबाड़ नहीं रह गए हैं. तेजी से बढ़ते ई-वेस्ट के बीच अब इन्हें ग्रीन जॉब्स, स्थानीय उद्यमिता और सर्कुलर इकोनॉमी के नए अवसर के रूप में देखा जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ई-कचरे का वैज्ञानिक, सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से प्रबंधन किया जाए तो यह न केवल पर्यावरण संरक्षण में मदद करेगा, बल्कि हजारों युवाओं, तकनीशियनों, स्वयं सहायता समूहों और छोटे कारोबारियों के लिए रोजगार का स्थायी माध्यम भी बन सकता है. उत्तराखंड में भी सरकार इस दिशा में कई योजनाओं पर काम कर रही है.
ई-कचरे में छिपा रोजगार का खजाना!
ई-वेस्ट की बढ़ती चुनौती में छिपे हैं रोजगार के अवसर: देश में मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, रेफ्रिजरेटर, बैटरियां, तार और छोटे-बड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. तकनीक तेजी से बदल रही है, जिसके कारण लोग पुराने उपकरणों की जगह नए उत्पाद खरीद रहे हैं. ऐसे में हर साल ई-वेस्ट की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है. अब इसे केवल प्रदूषण और जहरीले कचरे के रूप में देखने के बजाय रोजगार और संसाधन प्रबंधन के नजरिए से भी देखा जाने लगा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि ई-वेस्ट प्रबंधन केवल बड़े रिसाइक्लिंग प्लांट तक सीमित नहीं है. इसकी शुरुआत उस समय से हो जाती है, जब कोई उपभोक्ता अपने पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को घर, दुकान या कार्यालय से बाहर निकालता है. इसके बाद संग्रह, छंटाई, प्राथमिक जांच, सुरक्षित भंडारण, परिवहन, मरम्मत, पुनः उपयोग और अंत में रिसाइक्लिंग तक की पूरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर मौजूद हैं.
आरएलजी सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड की प्रबंध निदेशक राधिका कालिया कहती हैं कि ई-कचरा प्रबंधन की मूल्य श्रृंखला रिसाइक्लिंग प्लांट से नहीं, बल्कि उपभोक्ता के घर, दुकान या कार्यालय से शुरू होती है. किसी उपकरण के रिसाइक्लिंग प्लांट तक पहुंचने से पहले उसका संग्रह, परीक्षण, मरम्मत, पुनः उपयोग, पुर्जों की छंटाई, सुरक्षित भंडारण, परिवहन और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसी कई प्रक्रियाएं होती हैं. यही गतिविधियां छोटे उद्यमों, स्थानीय तकनीशियनों, स्टार्टअप और प्रशिक्षित संग्रहकर्ताओं के लिए नए व्यवसाय और रोजगार के अवसर तैयार करती हैं.
-राधिका कालिया, प्रबंध निदेशक, आरएलजी सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड-
हर खराब उपकरण कबाड़ नहीं: विशेषज्ञों का कहना है कि हर खराब इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को तुरंत तोड़कर रिसाइक्लिंग के लिए भेजना जरूरी नहीं होता. कई मोबाइल फोन, लैपटॉप और घरेलू उपकरण मामूली मरम्मत के बाद दोबारा उपयोग किए जा सकते हैं. वहीं पूरी तरह खराब हो चुके उपकरणों से भी स्क्रीन, कैमरा, सर्किट बोर्ड, मोटर, तार और अन्य उपयोगी पुर्जे निकाले जा सकते हैं. इससे एक ओर उत्पादों का जीवनकाल बढ़ता है तो दूसरी ओर कम कीमत पर उपकरण उपलब्ध होने से उपभोक्ताओं को भी फायदा मिलता है. साथ ही स्थानीय स्तर पर मोबाइल रिपेयर, कंप्यूटर सर्विसिंग और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत करने वाले तकनीशियनों के लिए लगातार रोजगार के अवसर भी तैयार होते हैं.
कलेक्शन सेंटर और स्टार्टअप बना सकते हैं नया बिजनेस मॉडल: जो उपकरण दोबारा उपयोग योग्य नहीं हैं, उनके लिए सुरक्षित संग्रह, छंटाई और भंडारण बेहद जरूरी है. विशेषज्ञों का मानना है कि हर जिले में महंगे धातु पुनर्प्राप्ति संयंत्र लगाना जरूरी नहीं है, लेकिन प्रत्येक शहर और जिले में जिम्मेदार कलेक्शन सेंटर और एग्रीगेशन नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए.
वार्ड स्तर पर छोटे संग्रह केंद्र, मोबाइल कलेक्शन वाहन और आवासीय सोसायटियों, स्कूलों, बाजारों व कार्यालय परिसरों में नियमित संग्रह अभियान चलाकर बड़ी मात्रा में ई-वेस्ट को अधिकृत रिसाइक्लरों तक पहुंचाया जा सकता है. ऐसे केंद्र केवल कबाड़ जमा करने के स्थान नहीं होंगे, बल्कि स्थानीय सेवा केंद्र के रूप में काम करेंगे, जहां उपकरण स्वीकार करने, प्राथमिक जांच, सुरक्षित पैकिंग, वजन दर्ज करने और अधिकृत रिसाइक्लिंग इकाइयों तक भेजने का काम किया जाएगा.
महिलाओं, स्टार्टअप और स्क्रैप्स डीलर की भी होगी अहम भूमिका: विशेषज्ञ का मानना है कि ई-वेस्ट प्रबंधन में स्वयं सहायता समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. ये समूह घर-घर जागरूकता अभियान चलाने, लोगों से ई-वेस्ट एकत्र करने और स्थानीय स्तर पर संग्रह अभियान संचालित करने का काम कर सकते हैं. वहीं स्टार्टअप ऑनलाइन पिकअप बुकिंग, डिजिटल रसीद, सामग्री की ट्रैकिंग और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसी सेवाएं विकसित कर सकते हैं. .
स्थानीय उद्यमी संग्रह, सुरक्षित परिवहन, उपकरण परीक्षण और पुनः उपयोग योग्य पुर्जों की ग्रेडिंग जैसे क्षेत्रों में अपना कारोबार शुरू कर सकते हैं. वहीं वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहे कबाड़ी और अनौपचारिक संग्रहकर्ताओं को व्यवस्था से बाहर करने के बजाय उन्हें प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण और अधिकृत संस्थाओं के साथ जोड़ने की जरूरत है. इससे उनकी आजीविका भी सुरक्षित रहेगी और ई-वेस्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन भी सुनिश्चित होगा.
उत्तराखंड में ई-वेस्ट पर तेज हुए प्रयास: उत्तराखंड आईटीडीए के निदेशक आलोक पांडे ने बताया कि राज्य में ई-वेस्ट प्रबंधन को लेकर पहले से ही नीति बनाई गई है और ‘वेस्ट टू बेस्ट’ की अवधारणा पर लगातार काम किया जा रहा है.
खराब हो चुके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का दोबारा उपयोग सुनिश्चित करने के लिए कई अभिनव प्रयास किए गए हैं. नगर निगम स्तर पर भी ई-वेस्ट के बेहतर उपयोग को लेकर योजनाएं बनाई जा रही हैं. महिलाओं के लिए प्रस्तावित पिंक पार्क में ई-वेस्ट से तैयार की गई विभिन्न कलाकृतियां और उपयोगी सामग्री प्रदर्शित की जाएगी. इसके अलावा ई-वेस्ट पार्क की भी योजना प्रस्तावित है, जहां लोगों को ई-कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन के प्रति जागरूक किया जाएगा और इससे जुड़ी तकनीकी जानकारियां भी उपलब्ध कराई जाएंगी.
-आलोक पांडे, निदेशक, उत्तराखंड आईटीडीए-
आलोक पांडे ने बताया कि उत्तराखंड के भगवानपुर में ई-वेस्ट डिस्पोजल के लिए प्लांट स्थापित किया गया है, जो देश के चुनिंदा अधिकृत ई-वेस्ट प्रोसेसिंग प्लांट्स में शामिल है. उनके अनुसार राज्य सरकार का उद्देश्य केवल ई-कचरे का निपटान करना नहीं, बल्कि इसे पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास और रोजगार सृजन के मजबूत माध्यम के रूप में विकसित करना भी है.