
महंत स्वामी श्रीनारायण चैतन्य महाराज ने किया उद्घाटन, रामभक्ति और सनातन संस्कृति के संदेश से गूंजा रामलीला मैदान
रुद्रपुर। नगर की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा की प्रतीक बस स्टैंड के सामने आयोजित होने वाली ऐतिहासिक श्रीरामलीला का गुरुवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। उद्घाटन मंदिर मनकामेश्वर कल्याण आश्रम, कल्याणी व्यू के महंत स्वामी श्रीनारायण चैतन्य महाराज ने फीता काटकर तथा भगवान श्रीराम की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर भगवान श्रीराम को पुष्प अर्पित किए गए और रामभजनों के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
मुख्य अतिथि महंत स्वामी श्रीनारायण चैतन्य महाराज ने श्रद्धालुओं, कमेटी पदाधिकारियों और कलाकारों को संबोधित करते हुए भगवान श्रीराम के नाम की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि राम नाम का स्मरण व्यक्ति के जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता है। उन्होंने विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से प्रभु भक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला।
श्रीरामलीला कमेटी, श्रीराम नाटक क्लब एवं श्री सनातन धर्म युवा मंच के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मुख्य अतिथि सहित अन्य अतिथियों का फूलमालाओं, रामनाम के पटके और शॉल भेंट कर स्वागत किया।
इस दौरान श्रीरामलीला कमेटी के अध्यक्ष मनोज गाबा ने कहा कि रामलीला भारतीय सनातन संस्कृति की प्राचीन और गौरवशाली परंपरा है। भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, मर्यादा, त्याग, पारिवारिक प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है। रामायण के प्रसंग आज भी समाज को आपसी सद्भाव, भाईचारे और आदर्श जीवन जीने का संदेश देते हैं।
पहले दिन हुआ नारद मोह की लीला का मंचन
रामलीला के प्रथम दिन कलाकारों ने नारद मोह की लीला का भावपूर्ण मंचन किया। कथा के अनुसार, देवर्षि नारद हिमालय में कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या से देवराज इंद्र चिंतित हो उठे और उन्होंने कामदेव को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा, लेकिन कामदेव अपने प्रयास में सफल नहीं हो सके।
तपस्या में सफलता के बाद नारद के मन में अहंकार उत्पन्न हो गया। उन्होंने अपनी विजय का वर्णन ब्रह्मा जी, भगवान शिव और भगवान विष्णु के समक्ष किया। भगवान शिव ने उन्हें इस प्रसंग को भगवान विष्णु के सामने न दोहराने की सलाह दी, लेकिन नारद ने उनकी बात नहीं मानी।
इसके बाद भगवान विष्णु ने नारद का अहंकार दूर करने के लिए अपनी लीला रची। रास्ते में एक सुंदर नगर और राजकुमारी विश्वमोहिनी के स्वयंवर को देखकर नारद मोहित हो गए। उन्होंने भगवान विष्णु से सुंदर रूप प्रदान करने की प्रार्थना की, लेकिन भगवान ने उन्हें वानर जैसा मुख दे दिया। स्वयंवर में राजकुमारी ने भगवान विष्णु को वरमाला पहना दी। अपनी स्थिति का पता चलने पर नारद क्रोधित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया।
अंततः भगवान विष्णु की माया दूर होने पर नारद को अपनी भूल का एहसास हुआ। उनका अहंकार समाप्त हुआ और उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी। इस प्रसंग के माध्यम से कलाकारों ने दर्शाया कि अहंकार व्यक्ति के विवेक को प्रभावित करता है, जबकि विनम्रता और भक्ति जीवन को सही दिशा प्रदान करती हैं।
कलाकारों ने निभाए विभिन्न पात्र
प्रथम दिवस की लीला में नारद की भूमिका मनोज मुंजाल, देवराज इंद्र की भूमिका वैभव भुड्डी, कामदेव की भूमिका हर्ष अरोरा, ब्रह्मा जी की भूमिका सिद्धांत ग्रोवर, भगवान शिव की भूमिका रवि चोपड़ा तथा भगवान विष्णु की भूमिका मनोज अरोरा ने निभाई। वहीं, विश्वमोहिनी एवं लक्ष्मी जी की भूमिका कनव गंभीर ने निभाई। कालादेव के रूप में राम कृष्ण कन्नौजिया, पीला देव के रूप में रजत अरोरा और मंत्री की भूमिका में गुरशरण बब्बर शरणी नजर आए।
कार्यक्रम का संयुक्त संचालन श्रीरामलीला कमेटी के मंच सचिव विजय जग्गा एवं संदीप धीर ने किया।
इस अवसर पर श्रीरामलीला कमेटी के अध्यक्ष मनोज गाबा, महामंत्री सुशील गाबा, कोषाध्यक्ष सीए अमित गंभीर, समन्वयक राजेश छाबड़ा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष नरेश शर्मा, विजय अरोरा, हरीश अरोरा, महावीर आजाद, सचिव अमित अरोरा बोबी, राकेश सुखीजा, डायरेक्टर सुभाष खंडेलवाल, संदीप धीर, मंच सचिव विजय जग्गा, विजय विरमानी, जगदीश टंडन, रघुवीर अरोरा, अजय फुटेला, विजय फुटेला, सुरेश मदान, रमेश अनेजा सहित श्रीरामलीला कमेटी, श्रीराम नाटक क्लब एवं मंच व्यवस्था से जुड़े अनेक पदाधिकारी, सदस्य और कलाकार उपस्थित रहे।



